अकल की दुकान

 

​एक गाँव में रोहन नाम का एक युवक रहता था। वह खुद को बहुत बुद्धिमान मानता था, लेकिन असल में था थोड़ा भोला। एक दिन उसके दिमाग में एक ज़बरदस्त आइडिया आया: "मैं अकल (बुद्धि) बेचूंगा!"

​उसने अपने घर के बाहर एक बड़ा बोर्ड लगाया, जिस पर लिखा था: "अकल की दुकान - यहाँ शुद्ध और ताज़ी अकल मिलती है!"

​यह खबर सुनकर पूरे गाँव में हलचल मच गई। लोग सोचने लगे कि क्या सच में अकल बेची जा सकती है?

​सबसे पहले कालूराम नाम का एक कंजूस आदमी उसकी दुकान पर आया।

​कालूराम ने रोहन से पूछा: "भई, तुम्हारी अकल का क्या दाम है?"

​रोहन ने सोचा कि इसे ऐसा दाम बताना चाहिए कि ये खरीदने से पहले सौ बार सोचे।

​रोहन बोला: "केवल 50 रुपये में एक 'गोल' अकल और 100 रुपये में एक 'चौकोर' अकल।"

​कालूराम ने सोचा, "50 रुपये भी बहुत हैं, लेकिन अगर अकल मिल जाए तो सारा काम आसान हो जाएगा।"

​कालूराम ने 50 रुपये दिए और बोला, "मुझे गोल अकल चाहिए।"

​रोहन ने तुरंत एक गोलाकार पत्थर उठाया, उसे रंगीन कागज़ में लपेटा और कालूराम को पकड़ा दिया।

​कालूराम पत्थर को देखकर बोला, "यह क्या है? ये तो पत्थर है!"

​रोहन हँसकर बोला, "हाँ, यही तो गोल अकल है। अब तुम्हारे पास अकल आ गई है, तो तुम खुद सोचो कि इसे कहाँ इस्तेमाल करना है!"

​कालूराम गुस्से से लाल हो गया, लेकिन रोहन ने पहले ही सबको बता दिया था कि जो उसकी दुकान से अकल खरीदेगा, उसे समझदारी से काम लेना होगा। कालूराम चुपचाप गोल पत्थर लेकर चला गया।

​अगले दिन, गाँव के जमींदार का बेटा, मोटूराम, दुकान पर आया। मोटूराम मोटा था, पर दिमाग से पैदल।

​मोटूराम ने आते ही कहा, "मुझे सबसे महंगी अकल चाहिए! मुझे चौकोर अकल दो!"

​रोहन ने मन ही मन सोचा, "वाह! आज तो डबल कमाई होगी।"

​रोहन ने 100 रुपये लिए और इस बार एक चौकोर ईंट को शानदार ढंग से लपेटा और मोटूराम को दे दिया।

​मोटूराम ने ईंट लेकर पूछा: "यह क्या है?"

​रोहन मुस्कुराया, "यह चौकोर अकल है! अब तुम्हारे पास 100 रुपये की अकल आ गई है, तो तुम खुद सोचो कि इसे क्या करना है!"

​मोटूराम ने ईंट को देखा, फिर अपने पेट को। वह थोड़ी देर सोचता रहा, फिर बोला, "ठीक है। इसे मैं घर ले जाता हूँ। अब मैं सबसे बुद्धिमान बन गया हूँ!"

​मोटूराम खुशी-खुशी ईंट लेकर चला गया। जाते-जाते उसने रोहन को धन्यवाद भी दिया।

​गाँव वालों ने जब कालूराम और मोटूराम को पत्थर और ईंट ले जाते देखा, तो सब जोर-जोर से हँसने लगे।

​लेकिन रोहन ने अपनी "अकल की दुकान" से खूब पैसे कमाए और अंत में, उसने एक असली दुकान खोल ली, जहाँ वह पत्थर और ईंटें नहीं, बल्कि किताबें और शिक्षा से जुड़ी चीजें बेचने लगा।

सीख: असली अकल बिकती नहीं, बल्कि खुद के अनुभव और सीखने से आती है।

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