भाई दूज कथा
भाई दूज (जिसे यम द्वितीया या भ्रातृ द्वितीया भी कहा जाता है) दीपावली पर्व के पाँचवें और अंतिम दिन, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। यह त्योहार भाई-बहन के अटूट प्रेम और सम्मान का प्रतीक है।
इस पर्व को मनाने के पीछे मुख्य रूप से यमराज (मृत्यु के देवता) और उनकी बहन यमुना जी (यमुना नदी) की कथा प्रचलित है:
भाई दूज की पौराणिक कथा (यम और यमुना की कहानी)
1. भाई-बहन का प्रेम और यम की व्यस्तता
पौराणिक कथा के अनुसार, सूर्य देव की पत्नी संज्ञा थीं। उनसे उन्हें दो संतानें प्राप्त हुईं— पुत्र यमराज (जिन्हें धर्मराज और मृत्यु का देवता कहा जाता है) और पुत्री यमुना (जो बाद में यमुना नदी के रूप में पृथ्वी पर आईं)।
यम और यमुना में बचपन से ही अपार स्नेह था। जब यमराज को यमलोक का कार्यभार सौंपा गया, तो वे अपने काम में इतने व्यस्त हो गए कि उन्हें अपनी बहन से मिलने का समय ही नहीं मिल पाता था।
यमुना अपने भाई के लिए बहुत चिंतित रहती थीं और उन्हें बार-बार अपने घर आकर भोजन करने का निमंत्रण भेजती थीं, लेकिन यमराज हमेशा काम की अधिकता बताकर टाल देते थे।
2. यम का बहन के घर आगमन
एक दिन, यमराज को अचानक अपनी बहन यमुना की बहुत याद आई। उन्होंने सोचा कि मैं तो मृत्यु का देवता हूँ और सबको दंड देने में व्यस्त रहता हूँ, क्या मैं अपनी बहन को इतना भी समय नहीं दे सकता?
यमराज ने तुरंत अपनी बहन से मिलने का निश्चय किया। जब वह कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को यमुना के द्वार पर पहुँचे, तो यमुना उन्हें देखकर अत्यंत प्रसन्न हुईं। उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
यमुना ने अपने भाई का पूरे आदर-सत्कार के साथ स्वागत किया। उन्होंने अपने भाई को स्नान कराया, उनकी पूजा की और अपने हाथ से तरह-तरह के स्वादिष्ट व्यंजन बनाकर उन्हें खिलाए। बहन के प्रेम और आतिथ्य को देखकर यमराज बहुत प्रसन्न हुए।
3. यमराज द्वारा वरदान देना
बहन के इस प्रेम और सेवाभाव से प्रसन्न होकर यमराज ने यमुना से कहा: "बहन, आज तुमने मुझे जो सुख दिया है, उससे मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुम मुझसे कोई भी वरदान मांग सकती हो।"
यमुना ने वरदान में कहा:
* "भैया, आप हर साल इसी दिन मेरे घर आया करो और मेरे हाथ का बनाया भोजन ग्रहण किया करो।"
* "और मुझे यह वरदान दो कि जो भी बहन इस दिन अपने भाई को आदर-सत्कार से तिलक करके भोजन कराएगी, उसे तुम्हारा (यमराज का) भय न रहे और उसके भाई को अकाल मृत्यु का डर न हो, तथा उसकी उम्र लंबी हो।"
4. तथास्तु और पर्व का आरंभ
बहन यमुना की बात सुनकर यमराज ने "तथास्तु" कहा। उन्होंने यह वरदान दिया कि जो भाई इस दिन अपनी बहन के घर जाएगा, उसके हाथों का भोजन करेगा, और तिलक करवाएगा, उसे यमलोक की यातनाएँ नहीं सहनी पड़ेंगी और उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहेगा।
यमराज ने यमुना को अमूल्य वस्त्र और आभूषण भेंट किए और अपने लोक लौट गए।
तभी से, यह परंपरा शुरू हो गई कि कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन बहनें अपने भाई को तिलक लगाती हैं, उन्हें भोजन कराती हैं और उनकी लंबी उम्र की कामना करती हैं, और भाई अपनी बहन को उपहार देकर उसकी रक्षा का वचन देता है। इसी कारण इस त्योहार को यम द्वितीया भी कहा जाता है।
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