गोवर्धन पूजा की कहानी

 गोवर्धन पूजा, जिसे अन्नकूट महोत्सव के नाम से भी जाना जाता है, दीपावली के अगले दिन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाया जाता है। इसके पीछे की पौराणिक कथा भगवान श्री कृष्ण और देवराज इंद्र के अहंकार से जुड़ी हुई है।

यहाँ गोवर्धन पूजा की विस्तृत कथा दी गई है:

गोवर्धन पूजा की कथा (भगवान कृष्ण ने इंद्र का मान-मर्दन किया)

1. इंद्र पूजा की तैयारी

बहुत समय पहले की बात है, जब भगवान श्री कृष्ण बाल्यावस्था में वृंदावन में निवास करते थे। एक बार उन्होंने देखा कि सभी ब्रजवासी (गोकुल के लोग) बड़े उत्साह के साथ तरह-तरह के पकवान बना रहे हैं और एक बहुत बड़े उत्सव की तैयारी कर रहे हैं।

उत्सुकता से भगवान कृष्ण ने अपनी माता यशोदा से पूछा, "मैया, यह किस उत्सव की तैयारी हो रही है और यह भोग किसे लगाया जाएगा?"

माता यशोदा ने उन्हें बताया, "लल्ला, यह देवराज इंद्र की पूजा की तैयारी है। इंद्रदेव वर्षा के देवता हैं। उनकी कृपा से ही अच्छी वर्षा होती है, जिससे खेतों में अन्न उगता है और हमारी गायों को चारा मिलता है। अगर हम उनकी पूजा नहीं करेंगे तो वे क्रोधित होकर वर्षा नहीं करेंगे, जिससे ब्रज में अन्न और जल का संकट आ जाएगा।"

2. कृष्ण द्वारा गोवर्धन पूजा का सुझाव

माता की बात सुनकर, श्री कृष्ण ने तर्क दिया, "मैया, इंद्रदेव तो हमें दर्शन भी नहीं देते, और वह तो अपने काम के लिए पूजे जा रहे हैं। हमें तो उस गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए, जो हर प्रकार से हमारी सहायता करता है। हमारी गायें वहीं चरती हैं, हमें फल-फूल मिलते हैं, और वही पर्वत बादलों को रोककर वर्षा कराने में सहायक होता है। इंद्रदेव तो केवल अहंकार में रहते हैं।"

कृष्ण की बात ब्रजवासियों को उचित लगी। उन्होंने निश्चय किया कि वे इंद्रदेव के बजाय गोवर्धन पर्वत और गौ-धन (गाय) की पूजा करेंगे। सभी ब्रजवासियों ने मिलकर अनेकों तरह के स्वादिष्ट पकवान बनाए, जिन्हें अन्नकूट कहा गया। फिर उन्होंने पर्वत के पास जाकर पूरे विधि-विधान से गोवर्धन पर्वत की पूजा की।

3. इंद्र का क्रोध और मूसलाधार वर्षा

जब देवराज इंद्र को पता चला कि ब्रजवासियों ने उनकी पूजा बंद करके एक साधारण पर्वत की पूजा शुरू कर दी है, तो उनका अहंकार और क्रोध भड़क उठा। उन्हें लगा कि एक बालक (कृष्ण) के कहने पर उनका अपमान किया गया है।

इंद्र ने क्रोध में आकर मेघों (बादलों) के प्रमुखों को आदेश दिया कि वे ब्रजमंडल में इतनी मूसलाधार और प्रलयकारी वर्षा करें कि गोकुल पूरी तरह से डूब जाए और सभी ब्रजवासी नष्ट हो जाएँ।

इंद्र के आदेश पर, ब्रजमंडल में भयंकर वर्षा शुरू हो गई। बिजली कड़कने लगी, तेज हवाएँ चलने लगीं और देखते ही देखते चारों ओर पानी भर गया। ब्रजवासी भयभीत होकर त्राहि-त्राहि करने लगे।

4. गोवर्धन पर्वत धारण लीला

सभी ब्रजवासी अपनी जान बचाने के लिए भागते हुए भगवान कृष्ण के पास पहुँचे और सहायता के लिए प्रार्थना करने लगे।

तब बाल कृष्ण ने अपनी दिव्य शक्ति से सभी ब्रजवासियों को अभयदान दिया। उन्होंने तुरंत अपनी बाईं हाथ की सबसे छोटी उंगली (कनिष्ठिका) पर गोवर्धन पर्वत को एक छाते की तरह उठा लिया।

भगवान कृष्ण ने सभी ब्रजवासियों और उनके पशुओं (गौ-धन) को पर्वत के नीचे शरण लेने के लिए कहा। सात दिनों तक इंद्रदेव ने लगातार अतिवृष्टि की, लेकिन पर्वत के नीचे खड़े होने के कारण ब्रजवासियों पर वर्षा की एक बूँद भी नहीं गिरी।

5. इंद्र का मान-मर्दन और क्षमा याचना

सात दिन तक लगातार बारिश करने के बाद भी जब इंद्रदेव ने देखा कि ब्रजवासियों का कोई नुकसान नहीं हुआ है, तो उन्हें एहसास हुआ कि यह कोई साधारण बालक नहीं हो सकता। यह कोई दिव्य शक्ति है जो उनका मान-मर्दन कर रही है।

अपनी शक्ति का घमंड टूटने और अपनी गलती का एहसास होने पर, इंद्रदेव तत्काल ब्रह्मा जी के पास गए। ब्रह्मा जी ने उन्हें बताया कि जिनसे वे मुकाबला कर रहे हैं, वे स्वयं भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण हैं।

यह जानकर, इंद्रदेव अत्यंत लज्जित हुए और तुरंत श्री कृष्ण के पास आए। उन्होंने उनसे अपनी गलती के लिए क्षमा माँगी और उनके समक्ष नतमस्तक हो गए।

6. गोवर्धन पूजा की शुरुआत

इंद्र का अहंकार टूटने के बाद, भगवान कृष्ण ने सातवें दिन गोवर्धन पर्वत को नीचे रखा और ब्रजवासियों को आशीर्वाद दिया। उन्होंने सभी को आदेश दिया कि अब से हर वर्ष कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा के दिन गोवर्धन पर्वत और गौ-धन की पूजा की जाएगी।

तभी से यह प्रथा शुरू हुई। इस दिन लोग गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाकर उसकी पूजा करते हैं, और तरह-तरह के पकवान (अन्नकूट) बनाकर भगवान श्री कृष्ण को भोग लगाते हैं। यह पर्व प्रकृति और गौ-धन के प्रति आभार प्रकट करने का संदेश देता है।


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