गोवर्धन पूजा त्यौहार
गोवर्धन पूजा (या अन्नकूट महोत्सव) कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को, दीपावली के अगले दिन, की जाती है। यह पूजा मुख्य रूप से घर के आंगन में या गायों के पास की जाती है।
गोवर्धन पूजा की विस्तृत और सरल विधि निम्नलिखित है:
गोवर्धन पूजा की विधि (Govardhan Puja Vidhi)
I. पूजा की तैयारी
* समय: यह पूजा मुख्य रूप से सुबह या दोपहर के समय की जाती है।
* स्थान: आंगन या पूजा स्थल को साफ करके गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाने की तैयारी करें।
* सामग्री:
* गोबर: गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाने के लिए ताज़ा गोबर।
* प्रतिमा: भगवान श्री कृष्ण (गिरिराज महाराज) की एक छोटी सी मूर्ति या तस्वीर।
* पूजा सामग्री: रोली, चावल (अक्षत), हल्दी, जल, फूल, धूप, दीपक, फल, मिठाई, और गायों के लिए चारा।
* अन्नकूट: कम से कम 56 या अपनी क्षमतानुसार अनेक प्रकार के शाकाहारी व्यंजन, विशेषकर बाजरे की खिचड़ी, कढ़ी, चावल, सब्ज़ियां, और मिष्ठान।
II. गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाना
* आकृति निर्माण: स्वच्छ जगह पर गोबर से गोवर्धन पर्वत की एक लेटी हुई आकृति बनाई जाती है।
* इस आकृति को मनुष्य के आकार का, या केवल पर्वत के आकार का भी बनाया जा सकता है।
* गोवर्धन के मध्य में एक छोटा सा स्थान खाली छोड़ा जाता है, जिसे नाभि कहा जाता है। इसमें दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल डालकर दीपक या कलश रखा जाता है।
* सजावट: गोवर्धन की इस आकृति को फूल, पत्तियों, दूर्वा और रंगीन धागों से सजाया जाता है।
* प्रतिष्ठापन:
* गोवर्धन पर्वत के पास भगवान श्री कृष्ण (गिरिराज महाराज) की मूर्ति स्थापित करें।
* गौ-धन (गाय) के प्रतीक के रूप में गोबर से गाय, बैल और अन्य पशुओं की छोटी-छोटी आकृतियाँ भी बनाई जा सकती हैं।
III. पूजा अनुष्ठान
* स्नान एवं वस्त्र धारण: पूजा करने वाले व्यक्ति स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
* जल और तिलक: सबसे पहले भगवान कृष्ण को जल अर्पित करें और फिर उन्हें रोली या चंदन का तिलक लगाएँ।
* पर्वत की पूजा: इसके बाद गोबर से बने गिरिराज महाराज (गोवर्धन पर्वत) को जल, रोली, अक्षत, और फूल अर्पित करें।
* भोग और अन्नकूट: गोवर्धन पर्वत की आकृति के सामने या उसके चारों ओर तैयार किए गए अन्नकूट (पकवानों के ढेर) और मिठाई का भोग लगाएँ। भोग लगाते समय "ॐ गोवर्धनाय नमः" मंत्र का जाप करें।
* गौ पूजा: गायों को स्नान कराकर उन्हें तिलक लगाएँ, फूल-माला पहनाएँ और उन्हें हरी घास या अन्नकूट का कुछ हिस्सा खिलाएँ। गायों को इस दिन विशेष सम्मान दिया जाता है।
* आरती और परिक्रमा:
* धूप-दीप जलाकर, घी के दीपक से गिरिराज महाराज की आरती करें।
* इसके बाद गोवर्धन पर्वत की आकृति की सात बार परिक्रमा करें। परिक्रमा करते समय श्री कृष्ण के जयकारे लगाएं।
* परिक्रमा के बाद, हाथ जोड़कर देवराज इंद्र के प्रकोप से बचाने के लिए भगवान कृष्ण का धन्यवाद करें और सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें।
IV. प्रसाद वितरण
* पूजा पूर्ण होने के बाद, गोवर्धन जी को अर्पित किए गए अन्नकूट के प्रसाद को परिवार और आस-पड़ोस के सभी लोगों में बाँटा जाता है।
* यह प्रसाद ग्रहण करना बहुत शुभ माना जाता है, क्योंकि यह भगवान कृष्ण का आशीर्वाद होता है।
इस पूजा में प्रकृति, गौ-धन और भगवान श्री कृष्ण के प्रति आभार व्यक्त किया जाता है।
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