कंजूस सेठ और जादुई टोपी

 

​बहुत समय पहले की बात है, एक छोटे से गाँव में कंजूसलाल नाम का एक बहुत ही लालची और कंजूस सेठ रहता था। वह इतना कंजूस था कि अपनी चाय में चीनी की जगह रेत डालता था ताकि चीनी कम खर्च हो। उसके पास ढेर सारा धन था, लेकिन वह किसी को एक पाई भी नहीं देता था।

​एक दिन एक बूढ़ा साधु सेठ कंजूसलाल के दरवाज़े पर आया। साधु बहुत थका हुआ और भूखा था। उसने सेठ से थोड़ी रोटी और पानी माँगा।

​कंजूसलाल ने नाक-भौं सिकोड़ी और बोला: "जाओ-जाओ बाबा! यहाँ खाने-पीने का कोई लंगर नहीं चलता। अपना काम करो और आगे बढ़ो।"

​साधु ने मुस्कुराते हुए कहा: "सेठ जी, आप बहुत अच्छे आदमी हैं। मैं आपको एक भेंट देना चाहता हूँ।"

​सेठ कंजूसलाल की आँखें चमक उठीं। "भेंट? क्या है?"

​साधु ने अपनी झोली से एक पुरानी, गंदी सी टोपी निकाली और सेठ को देते हुए बोला: "यह कोई साधारण टोपी नहीं है। जब आप इसे पहनकर कोई इच्छा करेंगे, तो वह पूरी हो जाएगी। बस एक शर्त है – आप इसे तभी पहन सकते हैं जब आप अकेले हों।"

​सेठ कंजूसलाल ने टोपी को देखा। उसे लगा कि यह कोई पुराना कचरा है, लेकिन भेंट के नाम पर मिली थी, तो ले ली। साधु मुस्कुराता हुआ चला गया।

​सेठ कंजूसलाल ने टोपी को अपने संदूक में फेंक दिया और भूल गया।

​कुछ दिनों बाद, सेठ के व्यापार में घाटा होने लगा। वह बहुत परेशान था। एक रात वह अपने कमरे में अकेला बैठा था, तभी उसकी नज़र संदूक पर पड़ी और उसे टोपी याद आई।

​उसने सोचा, "चलो, आज़मा ही लेते हैं। कौन सा मेरा कुछ जाएगा।"

​उसने वह पुरानी टोपी उठाई, धूल झाड़ी और अपने सिर पर रख ली। टोपी रखते ही उसे कुछ अजीब सा लगा। उसने मन ही मन सोचा: "काश, मेरे पास सोने के सिक्कों से भरा एक बक्सा होता!"

​और यह क्या! पलक झपकते ही उसके सामने सोने के सिक्कों से भरा एक बड़ा सा लकड़ी का बक्सा आ गया! सेठ की आँखें फटी की फटी रह गईं। वह खुशी के मारे उछल पड़ा।

​अगले दिन सेठ ने फिर टोपी पहनी और सोचा: "काश, मेरे पास गाँव की सबसे सुंदर हवेली होती!"

और देखते ही देखते, उसकी पुरानी कुटिया की जगह एक भव्य हवेली खड़ी हो गई!

​अब तो सेठ कंजूसलाल को पूरा यकीन हो गया कि यह टोपी जादुई है। वह हर रात अकेले में टोपी पहनकर अपनी इच्छाएँ पूरी करने लगा। उसने बेशुमार धन, हीरे-जवाहरात और नौकर-चाकर सब कुछ पा लिया।

​एक दिन सेठ ने सोचा: "अब मेरे पास सब कुछ है। बस एक चीज़ नहीं है – अमरत्व! काश, मैं कभी न मरूँ!"

​उसने टोपी पहनी और यह इच्छा की।

​लेकिन इस बार कुछ गड़बड़ हो गई। वह अमर तो बन गया, लेकिन उसकी उम्र वहीं थम गई और वह पत्थर का बन गया! क्योंकि टोपी ने इच्छा पूरी करने के लिए उसे एक मूर्ति में बदल दिया, जो न कभी मरती है और न ही बूढ़ी होती है!

​अगले दिन जब नौकरों ने सेठ को पत्थर की मूर्ति बने देखा, तो डर गए। गाँव वालों ने सोचा कि सेठ को भगवान ने उसकी कंजूसी की सज़ा दी है।

​टोपी कहीं ज़मीन पर गिर गई और फिर कभी किसी के हाथ नहीं आई। और सेठ कंजूसलाल की पत्थर की मूर्ति आज भी उसी हवेली में खड़ी है, जो उसकी लालच की निशानी बनी हुई है।

सीख: लालच बुरी बला है, और कुछ इच्छाएँ पूरी होना अच्छा नहीं होता।

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