धनतेरस की कथा

 धनतेरस की दो मुख्य कथाएँ प्रचलित हैं:

1. भगवान धन्वंतरि के प्रकट होने की कथा (समुद्र मंथन)

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था। इस मंथन का उद्देश्य अमृत प्राप्त करना था, जिससे अमरता मिल सके।

 * मंथन के दौरान, चौदह रत्न निकले, जिनमें से एक थे भगवान धन्वंतरि।

 * भगवान धन्वंतरि अपने हाथों में अमृत से भरा कलश (घड़ा) लेकर प्रकट हुए थे।

 * जिस दिन वह प्रकट हुए, वह कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि थी।

 * चूँकि भगवान धन्वंतरि अपने साथ अमृत कलश लेकर आए थे और उन्हें आयुर्वेद तथा चिकित्सा का देवता माना जाता है, इसलिए उनके प्रकट होने की इस तिथि को 'धनतेरस' या 'धनत्रयोदशी' के रूप में मनाया जाने लगा।

 * इस दिन उनकी पूजा करने से आरोग्य (अच्छा स्वास्थ्य) और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। इसी कारण इस दिन लोग नए बर्तन, खासकर पीतल के बर्तन, खरीदते हैं।

2. राजा हेम और यमराज की कथा (यम दीप दान)

एक अन्य प्रसिद्ध कथा मृत्यु के देवता यमराज और एक राजा हेम के पुत्र से जुड़ी है:

 * प्राचीन काल में एक राजा हेम थे। ज्योतिषियों ने उनके पुत्र के जन्म के समय भविष्यवाणी की थी कि जब राजकुमार का विवाह होगा, उसके ठीक चौथे दिन सर्प के काटने से उसकी मृत्यु हो जाएगी।

 * राजा यह सुनकर बहुत दुखी हुए। उन्होंने राजकुमार को ऐसी जगह भेज दिया जहाँ कोई स्त्री न हो।

 * लेकिन विधि के विधान को कौन टाल सकता है, संयोगवश राजकुमार का विवाह एक अत्यंत सुंदर और बुद्धिमती राजकुमारी से हो गया।

 * जब विवाह के चौथे दिन मृत्यु का समय आया, तो राजकुमारी ने अपने पति को बचाने का निश्चय किया। उसने उस दिन पूरे घर को खूब सारे दीयों से सजा दिया।

 * उसने पति को जगाए रखने के लिए ढेर सारे सोने और चांदी के आभूषण और सिक्कों को घर के मुख्य द्वार पर एक ऊँचे ढेर के रूप में रख दिया। उसने रात भर अपने पति को कहानियाँ और गीत सुनाए ताकि वह सो न जाएँ।

 * जब यमराज, सर्प के रूप में राजकुमार के प्राण हरने आए, तो द्वार पर दीयों की तेज़ रोशनी और आभूषणों की चमक से उनकी आँखें चौंधिया गईं।

 * यमराज उस ढेर पर बैठ गए और रात भर राजकुमारी के मधुर गीत और कहानियाँ सुनते रहे। सुबह होने पर, यमराज को बिना प्राण लिए ही वापस लौटना पड़ा, क्योंकि राजकुमार के जीवन का समय समाप्त हो गया था।

 * इस तरह राजकुमारी ने अपनी बुद्धिमत्ता और साहस से यमराज को वापस जाने पर मजबूर कर दिया और अपने पति के जीवन की रक्षा की।

 * इस घटना के बाद से ही, धनतेरस की शाम को यमराज के लिए 'यम दीप दान' करने की परंपरा शुरू हुई। माना जाता है कि ऐसा करने से अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है।

इन दोनों कथाओं के कारण ही धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी, कुबेर और यमराज की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है।


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