एक पुरानी हवेली का रहस्य
गाँव से थोड़ी दूर, एक सुनसान पहाड़ी पर एक बहुत पुरानी हवेली थी। लोग कहते थे कि उस हवेली में बुरी आत्माओं का वास है। गाँव में कोई भी उस हवेली के पास से गुजरने की हिम्मत नहीं करता था, खासकर रात में। लेकिन चार दोस्त - रवि, समीर, प्रीति और नेहा - इन सब बातों पर विश्वास नहीं करते थे। वे शहरी थे और उन्हें लगता था कि ये सब बस पुरानी कहानियाँ हैं।
एक दिन, उन्होंने शर्त लगाई कि वे रात को उस हवेली में जाएंगे और साबित करेंगे कि भूतों का कोई अस्तित्व नहीं होता। जैसे ही रात हुई, चारों अपनी बाइक से हवेली की ओर चल पड़े। हवेली के पास पहुँचते ही एक अजीब सी खामोशी छा गई। हवा में एक अजीब सी ठंडक थी, जैसे कोई अदृश्य शक्ति उन्हें घेर रही हो। हवेली का मुख्य द्वार जंग खाया हुआ था और एक भयानक चीख के साथ खुला।
अंदर जाते ही, उन्हें धूल और सीलन की तेज गंध आई। टूटे हुए फर्नीचर, मकड़ी के जाले और दीवारों पर बनी अजीबोगरीब आकृतियाँ माहौल को और भी डरावना बना रही थीं। प्रीति को डर लगने लगा। उसने कहा, "मुझे लगता है हमें वापस चलना चाहिए।" लेकिन रवि, जो सबसे ज्यादा बहादुर बनने की कोशिश कर रहा था, हँसा और बोला, "अरे, यह सब बस तुम्हारा दिमाग है।"
वे धीरे-धीरे हवेली के अंदरूनी हिस्सों में जाने लगे। एक बड़े कमरे में उन्हें एक पुराना पियानो दिखा। समीर ने मजाक में एक कुंजी दबाई, और अचानक बिना किसी के छुए पियानो से एक भयानक धुन बजने लगी। चारों जम से गए। उनके रौंगटे खड़े हो गए।
तभी, नेहा को लगा कि किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा है। वह चिल्लाई और पीछे मुड़ी, लेकिन वहाँ कोई नहीं था। सिर्फ एक ठंडी हवा का झोंका उसके पास से गुजरा। अब तक, रवि भी घबरा चुका था।
वे जल्दी से बाहर निकलने का रास्ता खोजने लगे। सीढ़ियों से नीचे उतरते समय, उन्होंने एक बंद दरवाजे से हल्की रोशनी आते देखी। जिज्ञासावश, रवि ने दरवाजा खोला। अंदर एक छोटा सा कमरा था, जिसके बीच में एक पुराना झूला पड़ा था। झूले पर एक छोटी बच्ची की तस्वीर लटकी हुई थी। जैसे ही उन्होंने कमरे में कदम रखा, झूला अपने आप धीरे-धीरे हिलने लगा।
अचानक, रोशनी टिमटिमाने लगी और कमरा पूरी तरह अंधेरे में डूब गया। उन्होंने एक छोटी बच्ची की धीमी रोने की आवाज सुनी, जो धीरे-धीरे तेज होती जा रही थी। अब वे पूरी तरह से आतंकित थे। वे चीखते हुए बाहर की ओर भागे।
जैसे-तैसे वे हवेली से बाहर निकले और अपनी बाइक की ओर भागे। पीछे मुड़कर देखा तो हवेली की एक खिड़की से एक छोटी बच्ची की परछाई उन्हें घूर रही थी। वे बिना रुके, जितनी तेज हो सके, गाँव की ओर भागे। उस दिन के बाद से, उन्होंने कभी भी भूतों पर अविश्वास नहीं किया।
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