मत्स्य अवतार: प्रलय से सृष्टि की रक्षा
बहुत प्राचीन काल की बात है, एक महान और पुण्यात्मा राजा थे, जिनका नाम सत्यव्रत था। वह अत्यंत धर्मनिष्ठ थे और अक्सर तपस्या में लीन रहते थे। एक दिन, जब राजा सत्यव्रत नदी में जल अर्पित कर रहे थे, तो उनकी अंजुली में एक छोटी सी मछली (मत्स्य) आ गई।
मछली ने राजा से अत्यंत दीन स्वर में प्रार्थना की, "हे राजन, मैं इस बड़े संसार में बहुत छोटी हूँ। मुझे बड़ी मछलियाँ खा जाएँगी। मेरी रक्षा कीजिए!"
दयालु राजा सत्यव्रत को उस मछली पर दया आ गई। उन्होंने उसे एक छोटे से जलपात्र में रख दिया। लेकिन कुछ ही दिनों में, वह मछली इतनी बड़ी हो गई कि वह उस पात्र के लिए छोटी पड़ गई। मछली ने फिर राजा से विनती की कि वह उसे किसी बड़े स्थान पर रखें।
राजा ने मछली को उठाकर एक सरोवर में डाल दिया। लेकिन आश्चर्य! मछली का आकार फिर तेज़ी से बढ़ने लगा और कुछ ही दिनों में वह सरोवर भी उसके लिए छोटा पड़ गया।
इसके बाद, राजा ने उसे एक बड़ी झील में, और फिर अंत में उसे समुद्र में डाल दिया। समुद्र में जाते ही, उस मछली का आकार विशालकाय हो गया।
तब राजा सत्यव्रत समझ गए कि यह कोई साधारण मछली नहीं है। उन्होंने हाथ जोड़कर पूछा, "हे प्रभु, आप कौन हैं? मुझे अपना वास्तविक परिचय दें।"
तब मछली ने अपने दिव्य रूप का परिचय दिया और बताया कि वह साक्षात भगवान विष्णु का प्रथम अवतार, मत्स्य अवतार है।
भगवान विष्णु ने राजा को बताया कि अब से सात दिनों के बाद, इस पृथ्वी पर एक भयानक जल प्रलय (महाप्रलय) आएगा, जो पूरी सृष्टि को जल में डुबो देगा।
भगवान ने राजा को आदेश दिया, "हे सत्यव्रत, तुम सभी प्रकार के बीजों, प्रत्येक प्रजाति के जानवरों के एक-एक जोड़े, और सप्त ऋषियों को लेकर एक विशाल नौका (नाव) में बैठ जाना।"
सातवें दिन, आकाश में घनघोर बादल छा गए और भयंकर वर्षा शुरू हो गई। देखते ही देखते, पूरी पृथ्वी जलमग्न हो गई। राजा सत्यव्रत ने भगवान के आदेशानुसार सभी आवश्यक चीजों को लेकर नाव में प्रवेश किया, और सप्त ऋषि भी उनके साथ थे।
जब प्रलय अपने चरम पर था, तो उस विशालकाय मत्स्य रूपी भगवान विष्णु प्रकट हुए। उनकी एक आँख से जलते हुए, राजा ने देखा कि भगवान के सिर पर एक लंबा, चमकीला सींग है। राजा ने नाव को उस सींग से बांधने के लिए वासुकी नाग की रस्सी का प्रयोग किया।
मत्स्य रूपी भगवान विष्णु उस प्रलय के जल में उस नाव को लेकर तैरते रहे। इस दौरान, उन्होंने राजा सत्यव्रत और सप्त ऋषियों को ब्रह्मांड के ज्ञान, वेदों और पुराणों का उपदेश दिया।
जब प्रलय समाप्त हुआ और जल नीचे उतरा, तब भगवान मत्स्य ने नाव को हिमालय के शिखर पर सुरक्षित उतार दिया। इस प्रकार, भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लेकर न केवल राजा सत्यव्रत और सप्त ऋषियों के माध्यम से सृष्टि के बीज को बचाया, बल्कि ज्ञान और धर्म को भी सुरक्षित रखा, ताकि एक नई सृष्टि की शुरुआत हो सके।
(Matsya Avatar: Pralay Se Srishti Ki Raksha)
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